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वैदिक काल से सूर्योपासना का प्रमुख केंद्र रहा बड़गांव का सूर्य पीठ

वैदिक काल से सूर्योपासना का प्रमुख केंद्र रहा बड़गांव का सूर्य पीठ

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बिहारशरीफ़ /राकेश कुमार । नालंदा जिला का सूर्य पीठ बड़गांव वैदिक काल से सूर्योपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां की महत्ता किसे से छुपी नहीं है। बड़गांव सूर्य मंदिर दुनिया के 12 अर्कों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि यहां छठ करने से हर मुराद पूरी होती हैं। यही कारण है कि देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु यहां चैत एवं कार्तिक माह में छठव्रत करने आते हैं। भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा बड़गांव से ही शुरू हुई थी जो आज पूरे भारत में लोक आस्था का पर्व बन गया है। मगध में छठ की महिमा इतनी उत्कर्ष पर थी कि युद्ध के लिए राजगीर आये भगवान कृष्ण भी बड़गांव पहुंच भगवान सूर्य की आराधना की थी। इसकी चर्चा सूर्य पुराण में है।
भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र साम्ब को मिली थी कुष्ठ रोग से मुक्ति: –
पंडाल कमेटी के सचिव शैलेश पांडेय बताते हैं कि ऐसी मान्यता है कि महर्षि दुर्वाशा जब भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका गये थे, उस समय भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी के साथ विहार कर रहे थे। उसी दौरान अचानक किसी बात पर भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र राजा साम्ब को अपनी हंसी आ गई। महर्षि दुर्वाशा ने उनकी हंसी को अपना उपहास समझ लिया और राजा साम्ब को कुष्ट होने का श्राप दे दिया। इस कथा का वर्णन पुराणों में भी है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने राजा साम्ब को कुष्ट रोग से निवारण के लिए सूर्य की उपासना के साथ सूर्य राशि की खोज करने की सलाह दी थी। उनके आदेश पर राजा शाम्ब सूर्य राशि की खोज में निकल पड़े। रास्ते में उन्हें प्यास लगी। राजा शाम्ब ने अपने साथ में चल रहे सेवक को पानी लाने का आदेश दिया। घना जंगल होने के कारण पानी दूर—दूर तक नहीं मिला। एक जगह गड्ढे में पानी तो था, लेकिन वह गंदा था। सेवक ने उसी गड्ढे का पानी लाकर राजा को दिया। राजा ने पहले उस पानी से हाथ—पैर धोया उसके बाद उस पानी से प्यास बुझायी। पानी पीते ही उन्होंने अपने आप में अप्रत्याशित परिवर्तन महसूस किया। इसके बाद राजा कुछ दिनों तक उस स्थान पर रहकर गड्ढे के पानी का सेवन करते रहे। राजा शाम्ब ने 49 दिनों तक बर्राक (वर्तमान का बड़गांव) में रहकर सूर्य की उपासना और अर्घ्यदान भी किया। इससे उन्हें श्राप से मुक्ति मिली । उनका कुष्ष्ट रोग पूरी तरह से ठीक हो गया।
राजा साम्ब ने बनवाया था बड़गांव का तालाब:-
राजा साम्ब ने गड्ढे वाले स्थान की खुदाई करके तालाब का निर्माण कराया। इसमें स्नान करके आज भी कुष्ट जैसे असाध्य रोग से लोग मुक्ति पाते हैं। आज भी यहां कुष्ठ से पीड़ित लोग आते हैं और तालाब में स्नान कर सूर्य मंदिर में पूजा अर्चना करने पर उन्हें रोग से निजात मिलती है।
तालाब खुदाई में मिली मूर्तियां:
तालाब की खुदाई के दौरान भगवान सूर्य, कल्प विष्णु, सरस्वती, लक्ष्मी, आदित्य माता जिन्हें छठी मैया भी कहते है सहित नवग्रह देवता की प्रतिमाएं निकलीं। बाद में राजा ने अपने दादा श्रीकृष्ण की सलाह पर तालाब के पास मंदिर बनवाकर स्थापित किया था। पहले तालाब के पास ही सूर्य मंदिर था। 1934 के भूकंप में मंदिर ध्वस्त हो गया। बाद में ग्रामीणों ने तालाब से कुछ दूर पर मंदिर का निर्माण कर सभी प्रतिमाओं को स्थापित किया। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र सूर्य तालाब में स्नान कर सूर्य मंदिर में पूजा अर्चना करने मात्र से कुष्ट जैसे असाध्य रोग से मुक्ति मिलती है। छठ महापर्व में पहुंचते हैं लाखों लोग ऐसे तो यहां सालों भर हर रविवार को हजारों श्रद्धालु इस तालाब में स्नान कर असाध्य रोगों से मुक्ति पाते हैं। लेकिन कार्तिक एवं चैत माह में लाखों श्रद्धालु यहां आकर विधि विधान से छठव्रत करते हैंं। अगहन और माघ माह में भी रविवार को यहां भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
तालाब के पानी से बनाया जाता है प्रसाद:
बड़गांव सूर्य तालाब के पानी से ही लोहंडा का प्रसाद बनाया जाता है। व्रत करने यहां आने वाले व्रती तालाब के पानी से ही प्रसाद बनाते हैं। पंडाल कमेटी के कमलेश पांडेय बनाते हैं कि आसपास के बड़गांव, सूरजपुर, बेगमपुर आदि गांवों के लोग भी इसी तालाब के पानी से छठ का प्रसाद बनाते हैं। उनका कहना है कि परंपरा काफी पुराना है, जो अबतक जारी है। लोगों में तालाब और सूर्य मंदिर के प्रति काफी श्रद्धा है।
चार दिनों तक चप्पल नहीं पहरते बड़गांव के लोग :
पवित्रता का पर्व छठ के नहाय से दूसरी अर्घ्य तक बड़गांव के ब्राह्मण टोले के लोग चप्पल नहीं पहरते हैं। यह परंपरा उनके बुजुर्गों द्वारा शुरू की गयी है, जिसका पालन अबतक किया जाता है। चप्पल नहीं पहरने का मुख्य मकसद यह कि व्रतियों को किसी तरह की असुविधा न हो। कष्टी करने वालीं व्रती सूर्य मंदिर तक जिस रास्ते से जाती हैं, वहीं रास्ते से वे भी अपने—अपने घरों तक जाते हैं। ऐसे में कभी—कभी भूलवश व्रती से पैर छू जाता है, जो गलत है। इसी कारण यहां के लोग छठ के दौरान चप्पल धारण नहीं करते हैं।

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