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मिथिला की पहचान है वाणेश्वरी भगवती स्थान

दुर्गापूजा में उमड़ती है भक्तों की भारी भीड़

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मिथिलांचल ब्यूरो
दरभंगा : तंत्र साधना के लिए विख्यात मां वाणेश्वरी भगवती की महिमा अपार है। लाल रंग का मुख्य द्वार पीले रंग की पाया मेहराव से झलकती सफेदी। नक्काशीनुमा आकृतियों से झांकती मंदिर की दिव्य भव्यता देख यहां पहुंचने वाले भक्त दिव्य आनंद का अनुभव करते हैं। गर्भ गृह के पूरव दुर्गा चालीसा का श्लोक तो पश्चिम दीवार पर बाणेश्वरी चालीसा के बीच आस्था में हिलकोरे लेने का मन करे तो आइए भंडारिसम-मकरन्दा स्थित वाणेश्वरी भगवती।

मान्यता है कि मां वाणेश्वरी भगवती यहां से आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। सच्चे मन से जिसने जो मांगा मिला। यही वजह है कि दशहरा व रामनवमी पर नेपाल सहित मिथिला के हर कोने से हजारों की संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं।

मान्यता है कि जो भी भक्त समर्पित भाव से मां वाणेश्वरी भगवती का अराधना करते हैं भगवती उनके मनोकामना अवश्य पूरी होती है। यही वजह है यहां सालों भर श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ लगी रहती है। कुमारी कन्याओं व ब्राह्मण भोजन का सिलसिला यहां सालों भर चलता रहता है।

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मान्यता है कि मुगल काल में औरंगजेब के शासन के दरम्यान शासक वर्ग के दुराचार व अत्याचार से मर्माहत कौलिक पुजारी वोण झा की अति सुंदरी पुत्री वाणेश्वरी ने प्रतिरोध लिया। तत्कालीन शासक ने वाणेश्वरी की  सुन्दरता की चर्चा सुनकर बलपूर्वक उन्हें उठा लेने के दौरान इन्होंने प्रस्तर रूप धारण कर लिया था। मंदिर से सटे पूरब एक तालाब से देवी वाणेश्वरी की मूर्ति का निकलना इसका ठोस प्रमाण माना जाता है। जिसे स्थानीय ग्रामीणों ने डीह पर पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित कर पूजा शुरू कर दी थी। इसी दौरान महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह की पत्नी महारानी लक्ष्मीवती ने यहां आकर पूजा करते हुए इनराथर स्थित अपने भाय श्रीनाथ मिश्र के लिए पुत्र प्राप्ति की याचना की। मन्नत पूरी होने पर भतीजे के जन्म के बाद उन्होंने 1872 ई. में वाणेश्वरी मंदिर का निर्माण किया गया, जो आज श्रद्धा का केंद्र बना है।

लगभग सात से दस फीट की ऊंचाई पर स्थित भगवती स्थान जिसे लोग डीह कहते है। पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहर की निशानी है। पाल कालीन भगवती मूर्ति तो यहां स्थापित है ही। साथ ही कर्नाट वंशीय शासकों के प्रशासकीय स्थल के साथ राजा शिव सिंह के गढ़ के रूप में भी इसकी पहचान है। डीह से दो किलोमीटर दक्षिण घौड़दौड़  ऐतिहासिक तालाब बगल में एक किलोमीटर गढ़ियारी पश्चिम राघोपुर गांव ऐतिहासिक घरानों से जुड़ा यह डीह चित्ती, कौड़ी से भरे विशाल भंडार, काले पत्थर की दुर्लभ मूर्तियां।

मंदिर के बाहरी परिसर में विशालकाय वृक्ष के नीचे स्थापित दुर्गा व शिवलिंग समेत अन्य देवी-देवताओं को सहेजे मिथिला के विशेष कालखंड को खुद में सहेजे मां भगवती विराजमान हैं। पुरातात्विक महत्व की दृष्टि से भी इस स्थल को विशेष अन्वेषण और अनुसंधान की आवश्यकता है।

डॉ. राममोहन झा, वाणेश्वरी न्यास समिति के अध्यक्ष राघवेंद्र झा, समाजसेवी संजीव कुमार झा सहित कई अन्य लोगों का कहना है कि वाणेश्वरी भगवती महोत्सव को पर्यटन विभाग के मेला महोत्सव की सूची में शामिल करने के लिए सरकार से मांग किया गया है।

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