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युद्ध से नहीं मिलते कोई जवाब – डॉ. कश्मीर उप्पल

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हमारे अपने देश के अच्छे समय में किसी दूसरे देश के बुरे समय के बारे में पढ़ी हुई किताब अंतत: अपने देश के बुरे समय में ही समझ आती है। ऐसे समय में किसी दूसरे देश के लोगों का भोगा हुआ यथार्थ हमारा अपना यथार्थ बन जाता है। देश में संसदीय चुनाव की इस बेला में कतिपय राजनेताओं द्वारा युद्ध संबंधी गतिविधियों को अपनी सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि बताते हुए एक युद्धाकांक्षी राष्ट्रवाद का उन्माद फैलाया जा रहा है। देशभर में ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि संशय होता है कि हम चुनाव के मुहाने पर नहीं, बल्कि युद्ध के मुहाने पर खड़े देश हैं। इस तरह युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद से यह संशय भी हो रहा है कि हम अपने जनप्रतिनिधि चुनने जा रहे हैं या अपने योद्धा। यह स्पष्ट है कि युद्धोन्मादी-राष्ट्रवाद का एक अर्थ राजनेताओं द्वारा अपनी जनता के प्रति प्रतिबद्धता के सवालों से बचना भी है।
ऐसे समय में विश्वयुद्ध के नतीजे भुगतने वाले देश रूस की पृष्ठभूमि में लिखे गए लेव तोलस्तोय ने चार खण्डों तथा लगभग डेढ़ हजार पृष्ठों में फैले उपन्यास ‘युद्ध और शान्ति’ को याद करना बेहद प्रासंगिक है। अपने इस उपन्यास में तोलस्ताय ने बताया है कि युद्ध सारे समाज, जीवन के सभी पक्षों, सभी वर्गों और श्रेणियों के लोगों पर कैसा, क्या प्रभाव डालता है। इस महान उपन्यास के हिन्दी अनुवादक डॉ. मदन लाल ‘मधु’ के अनुसार ‘इसमें जहां वीरता, आत्मरक्षा, देश रक्षा के लिए न्यौछावर किये जाने वाले वीरों का गान है, वहां युद्ध के भयानक परिणामों, व्यक्तियों और पूरे समाज के जीवन की नींव हिला देने वाले टकरावों के विरुद्ध शान्ति का प्रबल आव्हान भी है। महात्मा गांधी की जीवनी लिखने वाले फ्रांस के लेखक रोम्यां रोलां के अनुसार इस उपन्यास का ‘जीवन की भांति न तो आरंभ है और न अन्त। यह तो शाश्वत गतिशीलता में स्वयं जीवन है। अठारहवीं सदी के इस उपन्यास की यही गतिशीलता इक्कीसवीं शताब्दी में हमें भी युद्धों के विरुद्ध जागरुक और सजग कर रही है। लेव तोलस्ताय की पचासवीं पुण्यतिथि पर पं. जवाहर लाल नेहरु ने 1960 में कहा था कि ‘जीवन का सुख इसी में है कि लेव तोलस्तोय की भांति पृथ्वी पर लोगों की स्वतंत्रता तथा सौभाग्य के लिये संघर्ष किया जाये।’ हमारे देश में भी लोगों की स्वतंत्रता और सौभाग्य के लिये संघर्ष करने का समय आ गया है।युद्धोन्माद के इस समय में लेव तोलस्तोय का उपन्यास ‘युद्ध और शान्ति’ हमें एक प्रकाशस्तंभ के रुप में खड़ा नजर आता है। विश्व के कुछ अध्येताओं का मत है कि शान्ति के पर्यायवाची रुसी शब्द ‘मीर’ से तोलस्तोय का अभिप्राय शान्ति नहीं, बल्कि लोग, जनता या पूरा समाज है। इस महान उपन्यास के विचारों की समकालीनता हमारे लिये बढ़ती ही जा रही है। इसलिए एक भारतीय की दृष्टि से ‘युद्ध और शान्ति’ का भारतीय संदर्भों और परिवेश में पाठ जरुरी हो जाता है। तोलस्तोय के अनुसार राष्ट्र प्रमुखों के ऐतिहासिक तर्क-वितर्क के लचीले धागे को जब और अधिक खींचना संभव नहीं रहता तो इतिहासकार अपने बचाव में ‘महानताझ् संबंधी धारणा को आगे बढ़ा देते हैं। महानता तो मानो भले और बुरे को परखने की कसौटी ही समाप्त कर देती है। महान व्यक्ति तो कोई बुराई कर ही नहीं सकता। कोई भी अपराध ऐसा नहीं है जिसके लिये महान व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सके। वे आगे लिखते हैं कि महानता और हास्यास्पदता में केवल एक ही कदम का फासला है। जहां सरलता, भलाई और सच्चाई नहीं है, वहां महानता नहीं हो सकती।हम अपने देश के कुछ नेताओं में आज भी ‘युद्ध और शांतिझ् के नायक प्रिंस वसीली की चारित्रिक विशेषताएं देख सकते हैं। वसीली बहुत सोच-समझकर अपनी योजनाएं नहीं बनाता था और अपने फायदे के लिए दूसरों का बुरा करने की सोचता था। परिस्थितियों और लोगों की निकटता के अनुसार निरन्तर उसकी योजनाएं और मंसूबे बनते रहते थे जिनके संबंध में वह खुद भी अच्छी तरह से सोच-विचार नहीं करता था, किन्तु वही उसके जीवन की दिलचस्पी होते थे। एक वक्त में उसकी एक ही योजना या मंसूबा नहीं, बल्कि दसियों योजनाएं और मंसूबे होते थे जिनमें से कुछ जन्म लेने लगते थे, कुछ सिर चढ़ने और कुछ नष्ट किये जाने वाले होते थे। हम सत्ता की बहुत अधिक बात करते हैं, पर सत्ता है क्या? तोलस्तोय सत्ता की विस्तृत चर्चा करते हुए कहते हैं कि सत्ता जनसाधारण की प्रकट या मौन सहमति से उनके द्वारा चुने गए शासकों को सौंपी जाती है। वे आगे कहते हैं कि शासकों को किन्हीं स्पष्ट एवं निश्चित शर्तों पर जनसाधारण की इच्छा सौंपी जाती है, लेकिन सत्ता के सभी संकटों, टकरावों और उसके विनाश तक का कारण शासक द्वारा उन शर्तों का पालन नहीं करना होता है।युद्ध का सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं के जीवन पर पड़ता है। समझ में नहीं आता कि पुरुष जंग के बिना रह ही क्यों नहीं सकते? नारियां ऐसा कुछ नहीं चाहतीं। ऐसा लगता है मानव जाति प्यार और दिल को लगने वाली ठेसों के लिये क्षमा के सिद्धांतों को भूल गई है और एक दूसरे की हत्या की कला को ही अपना सबसे बड़ा गुण मानने लगी है।आजकल राजनेता बात-बात पर पडौसी देश की सीमा को लांघने की बात करते हैं और उनके समर्थन में अपने-अपने घरों में सुरक्षित बैठे लोग भी नारे लगाते हैं। वे बार-बार उत्तेजना से भरकर सेनाओं से घिरी सीमा को लांघने की बात इसलिए करते हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि सीमा के उस पार क्या है? तोलस्तोय बताते हैं कि इस सीमा-रेखा से, जीवितों को मृतकों से अलग करने वाली इस रेखा से आगे पीड़ा और मृत्यु है। दो देशों के सैनिक आमने-सामने होते हैं, लेकिन उनके बीच अस्पष्टता और भय की रेखा-मानो जीवितों को मृतकों से अलग करने वाली रेखा ही विद्यमान रहती है। इस सीमा रेखा को लांघने का अर्थ ही है, मृत्यु से घिर जाना।युद्ध में जीत के बाद भी निरन्तर आगे बढ़ने का मन होता है। ऐसे ही समय एक सैनिक चाहे वह कितना ही बड़ा अधिकारी हो, अपने अन्तरमन से बात करता है। उसका मन प्रश्न करता है कि अगर ऐसा होने के पहले ही तुम दस बार घायल नहीं हो जाआगे, मारे नहीं जाओगे, या छले नहीं जाआगे तो क्या होगा? इस प्रश्न के बाद वह अपने आप को जवाब देता है-मृत्यु, घाव, परिवार की क्षति मुझे किसी भी चीज का भय नहीं। अनेक व्यक्ति मुझे प्रिय हैं, अच्छे लगते हैं-पिता, बहन, पत्नी-ये मुझे सबसे अधिक प्यारे हैं, फिर भी यह इतना भयानक और अस्वाभाविक प्रतीत होने के बावजूद, मैं इन सभी को ख्याति के एक क्षण में, लोगों के दिलों पर अपनी विजय, अपने प्रति लोगों के प्यार के लिए न्यौछावर कर दूंगा। आकाश में तैरते बादल सैनिकों के मन में युद्ध की व्यर्थता तथा शान्ति की महानता का बोध जगा देते हैं। यह कैसे हुआ कि मैंने इस ऊँचे आकाश को पहले कभी नहीं देखा और कितना सौभाग्यशाली हूं मैं कि मैंने इसे देख लिया है ! युद्धरत सैनिकों को प्रकृति के दृश्यों को देखकर युद्ध बेमानी लगता है। ठीक इसी तरह हमारे समाज के वे लोग भी युद्धोन्मादी बन जाते हैं जिन्होंने कभी प्रकृति को नहीं देखा, समझा होता है। विश्व भर में एक सी फैली प्रकृति के समान विश्व भर के लोगों के दुख-दर्द भी एक जैसे ही होते हैं। पूरे विश्व में युद्ध मानव के विवेक तथा मानवीय प्रकृति के सर्वथा प्रतिकूल है।

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